My Space

Thursday, May 10, 2007

Still couldnt think of a name.. do suggest! :-)

चारों और की यह कालिक जब और गहरी हुई..
कल्पना मेरी तुम्हारे चेहरे पर ठहरी हुई..

रात जब शब् की देहलीज़ पर आती है..
तन्हाई भी तुम्हारा ज़िक्र छेड़ जाती है..

तुम्हारे तस्सव्वुर को लिए साथ में..
हसिएँ यादों की मय लिए हाथ में..

हवाओँ को अपनी कहानी सुनाता हूँ..
अगली मुलाकात के अरमान उसे बताता हूँ..

तारीफ़ कैसे करूं, जब यह सोच सताती है..
धड़कन तेज़ हो कर, इसका जवाब दे जाती है..

सामने तुम्हारे, ज़बान इज़हार नहीं कर पाती है..
खामोशी आकोँ के ज़रिये तब, बयान कर जाती है..

हाल-ऐ-दिल, जो शब्द कभी बयां न कर पाते..
काश की तुम आखों की बात समझ जाते!

0 Comments:

Post a Comment

<< Home