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Wednesday, August 23, 2006

किस्मत के मैदान में लगे ख्वैशोँ के मेले थे ,
खुशियों के झूलों पर हम घंटों तक खेले थे ..

आखों में हजारों सपने थे , और सपनों पर यकीन ..
यह मुकम्मल जहां अपना था , आसमान भी और ज़मीन ..

फ़िक्र का कोई इल्म नहीं , जहां वाले भी हमसे नाराज़ हुए ..
फैला कर अपने पर , हम अपनी दुनिया में परवाज़ हुए ..

ख्वाइश बन गयी दुआ , और चाहत इबादत हो गयी ,
खुसियों की लगी लत , और उनकी आदत हो गयी ..


जाने क्यूँ हर सपना टूट गया , वक्त ने ऐसा फेर लिया ..
उड़ते हुए परिंदे को ग़म के भवंदर ने घेर लिया ..

रास्ते अलग क्या हुए , वो थो मुँह ही मोड़ गए ..
और जाते जाते , सब यादेँ भी पीछे चोदे गए ..

यादों के बंजर मैदान में , अब ख्वाब बिखरे पड़े हैं
और इन आखों में आँसू लिए , हम तनहा खड़े हैं ..

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